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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
गत्वा मधुवटीं चापि देव्यास्तीर्थं नरः शुचिः |  ७९   क
तत्र स्नात्वार्चय़ेद्देवान्पितॄंश्च प्रय़तः शुचिः |  ७९   ख
स देव्या समनुज्ञातो गोसहस्रफलं लभेत् ||  ७९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति