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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
कृतो देवैश्च राजेन्द्र पुनरुत्थापितस्तदा |  ८२   क
अभिगम्य स्थलीं तस्य गोसहस्रफलं लभेत् ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति