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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
अहश्च सुदिनं चैव द्वे तीर्थे च सुदुर्लभे |  ८४   क
तय़ोः स्नात्वा नरव्याघ्र सूर्यलोकमवाप्नुय़ात् ||  ८४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति