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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
मृगधूमं ततो गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |  ८५   क
तत्र गङ्गाह्रदे स्नात्वा समभ्यर्च्य च मानवः |  ८५   ख
शूलपाणिं महादेवमश्वमेधफलं लभेत् ||  ८५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति