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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
कुलम्पुने नरः स्नात्वा पुनाति स्वकुलं नरः |  ८८   क
पवनस्य ह्रदं गत्वा मरुतां तीर्थमुत्तमम् |  ८८   ख
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र वाय़ुलोके महीय़ते ||  ८८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति