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उद्योग पर्व
अध्याय ८८
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्तु सा वृहती श्यामा एकवस्त्रा सभां गता |  ८५   क
अशृणोत्परुषा वाचस्ततो दुःखतरं नु किम् ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति