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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततो नैमिषकुञ्जं च समासाद्य कुरूद्वह |  ९२   क
ऋषय़ः किल राजेन्द्र नैमिषेय़ास्तपोधनाः |  ९२   ख
तीर्थय़ात्रां पुरस्कृत्य कुरुक्षेत्रं गताः पुरा ||  ९२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति