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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेन्नरव्याघ्र व्रह्मणः स्थानमुत्तमम् |  ९५   क
तत्र वर्णावरः स्नात्वा व्राह्मण्यं लभते नरः |  ९५   ख
व्राह्मणश्च विशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् ||  ९५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति