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भीष्म पर्व
अध्याय ८१
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सञ्जय़ उवाच
सञ्छिद्य चापानि च तानि राज्ञां; तेषां रणे वीर्यवतां क्षणेन |  २   क
विव्याध वाणैर्युगपन्महात्मा; निःशेषतां तेष्वथ मन्यमानः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति