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भीष्म पर्व
अध्याय ८१
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सञ्जय़ उवाच
अचिन्तय़ित्वा स शरांस्तरस्वी; वृकोदरः क्रोधपरीतचेताः |  ३१   क
जघान वाहान्समरे समस्ता; नारट्टजान्सिन्धुराजस्य सङ्ख्ये ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति