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भीष्म पर्व
अध्याय ८१
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सञ्जय़ उवाच
महीं गताः पार्थवलाभिभूता; विचित्ररूपा युगपद्विनेशुः |  ४   क
दृष्ट्वा हतांस्तान्युधि राजपुत्रां; स्त्रिगर्तराजः प्रय़यौ क्षणेन ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति