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भीष्म पर्व
अध्याय ८१
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सञ्जय़ उवाच
तेषां रथानामथ पृष्ठगोपा; द्वात्रिंशदन्येऽव्यपतन्त पार्थम् |  ५   क
तथैव ते सम्परिवार्य पार्थं; विकृष्य चापानि महारवाणि |  ५   ख
अवीवृषन्वाणमहौघवृष्ट्या; यथा गिरिं तोय़धरा जलौघैः ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति