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अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
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नारद उवाच
अस्मिँल्लोके सदा ह्येते परत्र च सुखप्रदाः |  २६   क
त एते मान्यमाना वै प्रदास्यन्ति सुखं तव ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति