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द्रोण पर्व
अध्याय ८१
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाला हि जिघांसन्तो द्रोणं संहृष्टचेतसः |  ३   क
अभ्यवर्षन्त गर्जन्तः शरवर्षाणि मारिष ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति