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द्रोण पर्व
अध्याय ८१
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सञ्जय़ उवाच
ते गदे सहसा मुक्ते समासाद्य परस्परम् |  ३८   क
सङ्घर्षात्पावकं मुक्त्वा समेय़ातां महीतले ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति