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शान्ति पर्व
अध्याय ८२
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नारद उवाच
वभ्रूग्रसेनय़ो राज्यं नाप्तुं शक्यं कथञ्चन |  १७   क
ज्ञातिभेदभय़ात्कृष्ण त्वय़ा चापि विशेषतः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति