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शान्ति पर्व
अध्याय ८२
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वासुदेव उवाच
अनाय़सं मुने शस्त्रं मृदु विद्यामहं कथम् |  २०   क
येनैषामुद्धरे जिह्वां परिमृज्यानुमृज्य च ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति