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शान्ति पर्व
अध्याय ८२
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वासुदेव उवाच
स ते सौहृदमास्थाय़ किञ्चिद्वक्ष्यामि नारद |  ४   क
कृत्स्नां च वुद्धिं सम्प्रेक्ष्य सम्पृच्छे त्रिदिवङ्गम ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति