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शान्ति पर्व
अध्याय ८२
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वासुदेव उवाच
यस्य न स्युर्न वै स स्याद्यस्य स्युः कृच्छ्रमेव तत् |  ९   क
द्वाभ्यां निवारितो नित्यं वृणोम्येकतरं न च ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति