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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
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अर्जुन उवाच
तदहं पितुरावेद्य भृशं प्रव्यथितेन्द्रिय़ा |  १६   क
अभवं स च तच्छ्रुत्वा विषादमगमत्परम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति