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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
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अर्जुन उवाच
उषित्वेह विशल्यस्त्वं सुखं स्वे वेश्मनि प्रभो |  २८   क
पुनरश्वानुगमनं कर्तासि जय़तां वर ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति