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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
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अर्जुन उवाच
त्वत्प्रीत्यर्थं हि कौरव्य कृतमेतन्मय़ानघ |  ७   क
यत्तच्छृणु महावाहो निखिलेन धनञ्जय़ ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति