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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
दिवौकसां पुष्करिणीं समासाद्य नरः शुचिः |  १०२   क
न दुर्गतिमवाप्नोति वाजपेय़ं च विन्दति ||  १०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति