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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
तत्र कोटिस्तु तीर्थानां विश्रुता भरतर्षभ |  १०४   क
कूर्मरूपेण राजेन्द्र असुरेण दुरात्मना |  १०४   ख
ह्रिय़माणाहृता राजन्विष्णुना प्रभविष्णुना ||  १०४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति