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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
तत्रोदपानो धर्मज्ञ सर्वपापप्रमोचनः |  १०८   क
समुद्रास्तत्र चत्वारः कूपे संनिहिताः सदा |  १०८   ख
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र न दुर्गतिमवाप्नुय़ात् ||  १०८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति