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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
ये तु दानं प्रय़च्छन्ति निश्चीरासङ्गमे नराः |  १२०   क
ते यान्ति नरशार्दूल व्रह्मलोकं न संशय़ः ||  १२०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति