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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र कौशिकस्य मुनेर्ह्रदम् |  १२३   क
यत्र सिद्धिं परां प्राप्तो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ||  १२३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति