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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
अग्निधारां समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् |  १२७   क
अग्निष्टोममवाप्नोति न च स्वर्गान्निवर्तते ||  १२७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति