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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
कालिकासङ्गमे स्नात्वा कौशिक्यारुणय़ोर्यतः |  १३५   क
त्रिरात्रोपोषितो विद्वान्सर्वपापैः प्रमुच्यते ||  १३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति