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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
स्नात्वा कोकामुखे पुण्ये व्रह्मचारी यतव्रतः |  १३७   क
जातिस्मरत्वं प्राप्नोति दृष्टमेतत्पुरातने ||  १३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति