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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
अपि चास्मत्प्रिय़तरो लोके कृष्ण भविष्यसि |  १८   क
त्वन्मुखं च जगत्कृत्स्नं भविष्यति न संशय़ः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति