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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
सप्तगङ्गे त्रिगङ्गे च शक्रावर्ते च तर्पय़न् |  २५   क
देवान्पितॄंश्च विधिवत्पुण्यलोके महीय़ते ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति