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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
शिवीनिक्ष्वाकुमुख्यांश्च त्रिगर्तान्सैन्धवानपि |  २८   क
जघानातिरथः सङ्ख्ये वाणगोचरमागतान् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति