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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
तव प्रिय़हिते युक्तो महेष्वासो महावलः |  ३   क
चित्रपुङ्खैः शितैर्वाणैः कलशोत्तमसम्भवः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति