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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
नैमिषं प्रार्थय़ानस्य पापस्यार्धं प्रणश्यति |  ५४   क
प्रविष्टमात्रस्तु नरः सर्वपापैः प्रमुच्यते ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति