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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
ततो वाराणसीं गत्वा अर्चय़ित्वा वृषध्वजम् |  ६९   क
कपिलाह्रदे नरः स्नात्वा राजसूय़फलं लभेत् ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति