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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत व्रह्मर्षेर्गौतमस्य वनं नृप |  ९३   क
अहल्याय़ा ह्रदे स्नात्वा व्रजेत परमां गतिम् |  ९३   ख
अभिगम्य श्रिय़ं राजन्विन्दते श्रिय़मुत्तमाम् ||  ९३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति