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भीष्म पर्व
अध्याय ८२
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सञ्जय़ उवाच
असम्प्राप्तं ततस्तं तु क्षुरप्रेण महारथः |  १०   क
चिच्छेद समरे राजन्भीष्मस्तस्य धनुश्च्युतम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति