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भीष्म पर्व
अध्याय ८२
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सञ्जय़ उवाच
राक्षसाश्च पिशाचाश्च तथान्ये पिशिताशनाः |  ४४   क
समन्ततो व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति