द्रोण पर्व  अध्याय ८२

सञ्जय़ उवाच

स तय़ा वीरघातिन्या शक्त्या त्वभिहतो भृशम् |  १७   क
निर्भिन्नहृदय़स्तूर्णं निपपात रथान्महीम् ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति