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द्रोण पर्व
अध्याय ८२
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सञ्जय़ उवाच
सहदेवे ततः षष्टिं साय़कान्दुर्मुखोऽक्षिपत् |  १९   क
ननाद च महानादं तर्जय़न्पाण्डवं रणे ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति