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द्रोण पर्व
अध्याय ८२
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सञ्जय़ उवाच
वृहत्क्षत्रस्तु तं राजा नवत्या नतपर्वणाम् |  २   क
आजघ्ने त्वरितो युद्धे द्रोणानीकविभित्सय़ा ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति