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द्रोण पर्व
अध्याय ८२
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सञ्जय़ उवाच
मद्रेय़स्तु ततः क्रुद्धो दुर्मुखं दशभिः शरैः |  २०   क
भ्राता भ्रातरमाय़ान्तं विव्याध प्रहसन्निव ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति