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द्रोण पर्व
अध्याय ८२
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सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण च तीक्ष्णेन कौरव्यस्य महद्धनुः |  २४   क
सहदेवो रणे छित्त्वा तं च विव्याध पञ्चभिः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति