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द्रोण पर्व
अध्याय ८२
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सञ्जय़ उवाच
भज्यमानं वलं राजन्सात्वतेन महात्मना |  ३८   क
नाभ्यवर्तत युद्धाय़ त्रासितं दीर्घवाहुना ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति