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आदि पर्व
अध्याय ८३
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इन्द्र उवाच
सतां सकाशे पतितासि राजं; श्च्युतः प्रतिष्ठां यत्र लव्धासि भूय़ः |  ५   क
एवं विदित्वा तु पुनर्ययाते; न तेऽवमान्याः सदृशः श्रेय़सश्च ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति