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शान्ति पर्व
अध्याय ८३
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मुनिरु उवाच
उभे दृष्ट्वा दुःखसुखे राज्यं प्राप्य यदृच्छय़ा |  ६४   क
राज्येनामात्यसंस्थेन कथं राजन्प्रमाद्यसि ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति