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अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
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वसिष्ठ उवाच
अपत्यं युवय़ोर्देव वलवद्भविता प्रभो |  ४४   क
तन्नूनं त्रिषु लोकेषु न किञ्चिच्छेषय़िष्यति ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति