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अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
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वसिष्ठ उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु देवाः शक्रपुरोगमाः |  ५४   क
असुरस्तारको नाम तेन सन्तापिता भृशम् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति