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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
किमिच्छसि महीपाल मत्तः प्राप्तुममानुषम् |  २५   क
द्रष्टुं स्प्रष्टुमथ श्रोतुं वद कर्तास्मि तत्तथा ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति